आखिर कब थमेंगी महिलाओं के साथ हो रही घरेलू हिंसा?

 

ऋचा की सहकर्मी मोहिनी पिछले दो दिनों से ऑफिस नहीं आ रही है, जिसकी वजह ऑफिस में किसी को नहीं पता. ताज्जुब की बात यह है कि उसकी ऑफिस की पक्की सहेली ऋचा को भी नहीं पता की मोहिनी ने ऐसे बिना बताएं ऑफिस से छुट्टी क्यों ली है.

तीसरे दिन जब मोहिनी ऑफिस आई, तब पता चला की तीन दिन पहले उसके घर में हुए एक छोटे से झगड़े में उसके पति ने मोहिनी का सिर दीवार में ज़ोर से दे मारा। जिसके कारण सिर में तेज़ दर्द की वजह से उसे अस्पताल में सिटी स्कैन जैसी दो-तीन छोटी-मोटी जांचे करवानी पड़ी और इसी के चलते वह तीन दिन अपने काम पर नहीं आ पाई. फ़ेमिनिज़्म  पर यकीन रखने वाली ऋचा के लिए यह वाकया ख़ून खौला देने वाला था. क्योंकि मोहिनी के मुँह से इस तरह की बात वह पहले भी कई बार सुन चुकी थी.

  • गुस्से में आगबबूला होकर ऋचा तो मोहिनी के पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवाना चाहती थी लेकिन मोहिनी ने यह कहकर रोक दिया की इस बात का गलत असर उसके आठ साल के बेटे पर पड़ेगा और वो यह बिल्कुल नहीं चाहती की उसका बेटा अपने पिता को जेल जाते हुए देखे.

 

यह कहानी सिर्फ मोहिनी की ही नहीं बल्कि हमारे आसपास मोहिनी जैसी कई महिलाएँ की है जो रोज़ाना घरेलू हिंसा की शिकार होती है. लेकिन समाज, अपने परिवार, या अपने भविष्य के बारे में सोचकर यह सब चुपचाप सहती रहती है. यह बात भी गौरतलब है की घरेलू हिंसा की शिकार हर वर्ग की औरत होती है. फिर चाहे वह उच्च वर्गीय हो, मध्यम वर्गीय हो या निम्न वर्गीय हो. पति को परमेश्वर का दर्ज़ा देने वाले इस समाज में औरतों के लिए एक सुरक्षित घर भी नहीं है। 

 

 

यहाँ बात सिर्फ हाथ उठाने की ही नहीं है. किसी भी वैवाहिक जीवन में अगर पुरुष मौखिक रूप से अपनी पत्नी का हर वक़्त अपमान करता है, उसकी मौलिक इच्छाओं का दमन करता है या उसे अपशब्द कहता है तो यह सब घरेलू हिंसा ही कहलाती है.

पति-पत्नी का रिश्ता प्यार से मज़बूत बनता है और इसीलिए थोड़ी नोंक-झोंक इस रिश्ते में जायज़ है.लेकिन झगड़ा जब हद से ज़्यादा बढ़ जाये तो पुरुष अक्सर अपना आपा खो देते है और तैश में आकर अपनी पत्नी व बच्चों  पर हाथ उठा देते है या उनपर अपशब्दों की बौछार कर देते है. कई पुरुष तो इतने हिंसक हो जाते है की वह घर में ही नहीं बल्कि घर के बाहर भी अपनी पत्नी के साथ मारपीट शुरू कर देते है. और चूँकि हम पितृसत्तात्मक समाज का हिस्सा है, ऐसा करने के बाद बहुत कम पुरुषों को अपनी गलती का एहसास होता है या वो शर्मिंदा महसूस करते है. ज्यादातर पुरुष आज भी इसे अपना हक़ और पौरुष का प्रतीक मानते है.

 

 

लेकिन अब नारी का यह सब सहना किसी भी तरह से मंज़ूर नहीं किया जा सकता इसीलिए भारत के दंड विधान के अनुसार PWDVA 2005 व धारा 498A और धारा 304B के तहत अपराधियों को सजा का प्रावधान है.

इन धाराओं के तहत किसी भी महिला के आर्थिक अधिकारों का हनन, उनका यौन शोषण, और उन्हें शारीरिक व मानसिक तौर पर प्रताड़ित करना आपराधिक गतिविधि माना जाता है. आज से कुछ दशक पहले जब इस तरह के कानून के बारे में कम ही लोगों को जानकारी थी, तब घरेलू हिंसा बहुत ही आम बात थी. इतनी आम की घर के बड़े-बूढ़ों के सामने तक घर की महिलाओं को पीटा जाता था और वे लोग चुप्पी साधे देखते रहते थे. उस वक़्त महिलाओं  के पास यह हिंसा सहने के सिवा ज़्यादा विकल्प भी नहीं होते है. कुछ तो समाज की रुढ़िवादी सोच के चलते चुप रहती थी और कुछ को अकेलेपन और आर्थिक असुरक्षा का भय सताता था. अधिकांश महिलाओं का अशिक्षित होने की वजह से कोई नौकरी पा लेना भी

 

मुश्किल था.

 

 

परन्तु अब मंज़र कुछ और है. महिलाएं शिक्षित है और कुशल भी. कोई भी नौकरी करना या पाना अब महिलाओं के लिए उतनी टेढ़ी खीर नहीं रहा जितना पहले हुआ करता था. और जब कानून भी महिलाओं को सुरक्षित करने का हर संभव प्रयास कर रहा है तो कुछ हिम्मत तो महिलाओं को भी दिखानी ही होगी. जिसमें सबसे पहले उन्हें अपने डर पर काबू पाना होगा.

कम पढ़ी लिखी महिलाओं के लिए भी ऐसी कई स्वयंसेवी संस्थाएं है जो उन्हें रोज़गार के साथ साथ उचित आवास और शिक्षा प्रदान करती है.

 

 मोहिनी जैसी नौकरीपेशा महिला सिर्फ इस बात से डर रही है की उनके बच्चे पर पिता के जेल जाने का क्या असर होगा। लेकिन उनके बच्चे पर अपने पिता के ऐसे हिंसक बर्ताव का क्या असर होगा, ये वो नहीं समझ पा रही है. मोहिनी जैसी महिलाओं  को यह समझ लेना चाहिए की हिंसक व्यक्तियों का ज़मीर बहुत पहले ही मर चुका होता है और ऐसे व्यक्तियों को सबक सिखाना बहुत एक बेहतर समाज के निर्माण के लिए बहुत जरूरी है.

हमारे समाज में कई बुरी प्रथाएं  ख़त्म हो चुकी है लेकिन उनको ख़त्म करने के लिए भी किसी एक ने तो कदम उठाया ही होगा.

एक कदम आप भी उठा कर ज़रूर देखिये। शायद कुछ बदल जाये.

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